Tuesday, December 4, 2007

जब सोच की सुइयाँ चुभती हैं तो पेट में गुद गुद होती है......
ये लाइनें हैं बम्बई बाल इप्टा के एक नाटक के एक गीत की जिसका नाम है 'अगर और मगर'। लेखक हैं गुलज़ार। नाटक की थीम है पटरी से अलग सोचने और उससे बदल सकने वाली दुनिया की संभावना। जब पेट में गुड-गुड / गुद गुद होती है तो सो पाना मुश्किल हो जाता है और बदलना एक नींद छीनने वाली प्रक्रिया है। जब लोग बदलो से बचाओ की ओर भागने लगे हैं तो लगता है कि सोच की सुइयों की ज़्यादा ज़रूरत है। ये blog मेरी ओर से थोडी सी सप्लाई है। मेरे रत जगों में आपको निमंत्रण हैं.........

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